
एक गीत, और उसमें दस कहानियाँ
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कुछ गीत एक बात कहते हैं। यह गीत दस बातें कहता है।
केशव माधव गोपाल कृष्ण भगवान विष्णु के दसों अवतारों का भजन है — मछली, कछुआ, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और कल्कि। हर अंतरा एक छोटी-सी खिड़की जैसा है। आप उसमें झाँकते हैं, और पूरी कथा सामने आ जाती है।
अवतार का अर्थ है — वह रूप जो भगवान धरती पर आने के लिए धारण करते हैं। पुरानी मान्यता सीधी-सादी है: जब भी संसार मुश्किल में पड़ता है, सहायता आती है। कभी वह बहुत विशाल रूप में आती है, कभी बहुत छोटे रूप में। यह गीत दोनों दिखाता है।
यह भजन आठ सौ साल पुराने संस्कृत स्तोत्र प्रलय पयोधि जले पर आधारित है, जिसे कवि जयदेव ने अपने गीत गोविंद में लिखा था। हमने वही यात्रा सरल हिंदी में रखी है, ताकि गाते समय अर्थ ढूँढ़ना न पड़े।
आख़िरी पंक्ति तो आप पहले से जानते हैं
सबसे प्यारी बात यही है। इस भजन के हर अंतरे के अंत में यही पंक्तियाँ लौटकर आती हैं:
जय हो जग के नाथ प्रभु जी
जय जगदीश हरे
ज़रा दूसरी पंक्ति ज़ोर से बोलिए — जय जगदीश हरे। सुनी-सुनी लग रही है न?
यह वही पंक्ति है जिससे भारत की सबसे प्रसिद्ध आरती शुरू होती है — ॐ जय जगदीश हरे, जो हर शाम लाखों घरों में गाई जाती है। यह संयोग नहीं है। वह आरती उन्नीसवीं सदी में लिखी गई थी, और उसके रचयिता उसी टेक को दोहरा रहे थे जो जयदेव सात सौ साल पहले से गाते आ रहे थे।
इसलिए जैसे ही यह भजन अंतरे के अंत तक पहुँचता है, ज़्यादातर लोग अपने आप साथ गाने लगते हैं। आवाज़ को रास्ता पहले से पता होता है, मन बाद में पहुँचता है।
बोल और उनका अर्थ
हिंदी सरल है, इसलिए शायद आपको सहायता की ज़रूरत ही न पड़े। फिर भी, हर हिस्से के साथ एक छोटा-सा अर्थ दिया है।
आरंभ
केशव माधव, गोपाल कृष्ण, दीनों के रखवारे
दश रूपों में आए प्रभु जी, भक्तों के सहारे
जय हो जग के नाथ प्रभु जी, जय जगदीश हरे
अर्थ: केशव, माधव, गोपाल, कृष्ण — ये चारों एक ही प्रभु के प्यारे नाम हैं। वे उनका ध्यान रखते हैं जिनका कोई नहीं। अपने भक्तों का सहारा बनने के लिए वे दस अलग-अलग रूपों में आए।
दीनों के रखवारे — इस एक पंक्ति को पकड़ लीजिए। पूरा भजन असल में इसी एक बात के इर्द-गिर्द घूमता है।
१. मत्स्य — मछली का रूप
प्रलय-जल में डूबे जग में, वेदों को तुमने संभाला
नाव समान बनकर प्रभु ने, धर्म-दीप फिर से उजाला
हे केशव! मीन रूप धर आए, ज्ञान सुधा के धारे
अर्थ: प्रलय के जल ने सारा संसार डुबो दिया था और वेद हमेशा के लिए खो जाने वाले थे। प्रभु मछली बनकर आए और उन्हें सुरक्षित पार ले गए — ठीक वैसे, जैसे नाव लोगों को नदी पार कराती है। धर्म का दीपक फिर से जल उठा।
२. कूर्म — कछुए का रूप
धरती जब डगमग डोली थी, तुमने पीठ बिछाई
कच्छप रूप विशाल तुम्हारा, जग ने शरण पाई
धरणी-भार उठाकर प्रभु ने, सब संकट थे टारे
अर्थ: जब धरती डगमगा रही थी और टिक नहीं पा रही थी, तब प्रभु विशाल कछुआ बनकर आए और अपनी पीठ बिछा दी, ताकि धरती उस पर टिक सके। सारे संसार को आश्रय मिल गया।
३. वराह — वराह का रूप
दाँतों के शिखर पर धरती, तुमने फिर से धारी
जैसे चंदा पर हो छाया, शोभा लगी निराली
हे केशव! वराह रूप धर, भू को पार उतारे
अर्थ: धरती जल में समा गई थी। प्रभु वराह बनकर गहरे उतरे और उसे अपने दाँत की नोक पर उठा लाए। कवि कहता है कि वह दृश्य ऐसा सुंदर लगा जैसे चंद्रमा पर दिखने वाली हल्की छाया।
४. नरसिंह — आधे नर, आधे सिंह
कमल-करों के नख बने थे, अद्भुत तेज-कटारे
हिरण्यकशिपु का गर्व मिटाया, धर्म खड़ा द्वारे
नरहरि बनकर भक्त बचाया, अधर्म सभी संहारे
अर्थ: हिरण्यकशिपु नाम का क्रूर राजा मानता था कि उसे कोई छू नहीं सकता। प्रभु के कोमल कमल-जैसे हाथों के नख चमकती कटारों जैसे हो गए, और उस राजा का घमंड समाप्त हो गया। वे नरहरि बनकर आए, अपने भक्त को बचाया।
धर्म खड़ा द्वारे — यह पंक्ति बहुत सुंदर है। यह उस पुरानी कथा की ओर इशारा करती है कि यह सब देहरी पर, न भीतर न बाहर, घटा था।
५. वामन — छोटे बालक का रूप
तीन पगों की लीला करके, बलि का मान झुकाया
चरण-नखों से निकले जल ने, जन-जन को पावन बनाया
हे केशव! वामन बन आए, दीनों के रखवारे
अर्थ: राजा बलि का सब पर अधिकार था और उसे अपने पर बड़ा गर्व था। प्रभु छोटे बालक के रूप में आए और केवल इतनी भूमि माँगी जितनी वे तीन पग में नाप लें। फिर वे बढ़ते गए, और तीन पग में सारे लोक समा गए। कथा कहती है कि आकाश के शिखर पर उनके चरण-नख से जो जल निकला, वही गंगा बना।
६. परशुराम — फरसाधारी ऋषि
जब अधर्म से भर गए क्षत्रिय, जग में पाप बढ़ाया
भृगुपति बनकर तुमने प्रभु जी, अन्याय-भार हटाया
भव-तापों को शांत किया तुम, धर्म-द्वार फिर खोले
अर्थ: कुछ राजा अन्यायी हो गए थे और अपनी ही प्रजा को कष्ट दे रहे थे। प्रभु भृगुपति — यानी परशुराम — बनकर आए और संसार से अन्याय का बोझ हटाया। युग का ताप शांत हुआ, और धर्म का द्वार फिर खुल गया।
७. राम — अयोध्या के राजकुमार
रघुपति बनकर रण में तुमने, रावण शीश गिराए
दशमुख के अभिमान को हरकर, सत्य-ध्वज लहराए
धर्म, मर्यादा, प्रेम-पथ के, तुम उजले उजियारे
अर्थ: रघुपति — यानी भगवान राम — बनकर उन्होंने रणभूमि में दस सिर वाले रावण का अभिमान चूर किया। सत्य का ध्वज फिर लहराया। वे तीन चीज़ों के उजाले हैं: धर्म, मर्यादा, और प्रेम का मार्ग।
८. बलराम — हल धारण करने वाले
निर्मल तन पर मेघ-से वस्त्र, शोभित रूप तुम्हारा
हलधर बनकर तुमने प्रभु जी, धरती को संवारा
यमुना भी भय छोड़ तुम्हारे, चरणों में आ जाए
अर्थ: कृष्ण के बड़े भाई का रंग गोरा था और वस्त्र बादल-जैसे गहरे। उन्हें हलधर कहा गया — यानी हल उठाने वाले। हल किसान का औज़ार है, हथियार नहीं। पुरानी कथा कहती है कि उन्होंने यमुना को पास बुलाया था, और यहाँ गीत कहता है कि यमुना अपना भय छोड़कर उनके चरणों में आ गई।
९. बुद्ध — करुणा का रूप
करुणा-हृदय से तुमने देखा, पशु-बलि का दुख भारी
हिंसा के पथ को तुमने रोका, दया बनी तुम्हारी
बुद्ध रूप में प्रेम सिखाया, करुणा के तुम धारे
अर्थ: इस बार उन्होंने किसी से युद्ध नहीं किया। उन्होंने बस करुणा भरे हृदय से बलि में मारे जाते पशुओं का दुख देखा — और वह मार्ग रोक दिया। उन्होंने प्रेम सिखाया।
यहाँ जो बदलता है, उसे देखिए। नौ रूपों में शक्ति है। इस एक रूप में केवल कोमल हृदय है — और वह भी संसार बदल देता है।
१०. कल्कि — जो अभी आने वाले हैं
जब अधर्म अंधेरा फैलाए, जग का सत्य छिपाए
कल्कि बनकर करवाल धारी, दुष्टों को मिटाए
धूमकेतु-सा तेज तुम्हारा, तम के बंधन हारे
अर्थ: यह अवतार अभी हुआ नहीं है। जब अधर्म अँधेरे की तरह फैल जाएगा और सत्य को ढक देगा, तब प्रभु कल्कि बनकर आएँगे। उनका तेज आकाश में धूमकेतु की तरह चमकेगा, और अँधेरे के सारे बंधन हार जाएँगे।
समापन
जयदेव कवि की यह वाणी, सुख-शुभ रस बरसाए
जो भी प्रेम सहित इसे सुने, भव-सागर तर जाए
दस-दस रूपों में तुम आए, जग के पालनहारे
अर्थ: यह कवि जयदेव की वाणी है, जो सुख और शुभ बरसाती है। जो भी इसे प्रेम से सुनता है, वह भवसागर पार कर जाता है। हे संसार के पालनहार, आप दस रूपों में आए।
और फिर आरंभ की पंक्तियाँ एक बार लौटकर आती हैं। भजन वहीं समाप्त होता है जहाँ से शुरू हुआ था — चार नामों और एक वचन के साथ।
हिंदी में क्यों?
संस्कृत इस गीत की जन्मभूमि है। जयदेव ने आठ सौ साल पहले जो अक्षर चुने थे, उन्हीं को गाने में एक अलग ही सुंदरता है। हम उसे बदल नहीं रहे।
पर अपनी भाषा में गाने पर कुछ और ही होता है। तब आप केवल ध्वनि नहीं बना रहे होते और यह आशा नहीं कर रहे होते कि भाव अपने आप आ जाएगा। तब आप ज़ुबान से कह रहे होते हैं कि एक वराह ने धरती को अपने दाँत पर उठा लिया था। कि एक छोटे बालक ने तीन पग में आकाश नाप लिया था। कि एक करुणा भरे हृदय ने पूरी हिंसा की परंपरा रोक दी थी।
बच्चे यह रूप एक ही बार सुनकर पकड़ लेते हैं। दादा-दादी हर शब्द समझ पाते हैं। किसी को कुछ बताना नहीं पड़ता।
हमारा सुझाव — दोनों रखिए। कथाएँ सीखनी हों तो हिंदी वाला गाइए। बहुत पुराने शब्दों को अपनी ज़ुबान पर महसूस करना हो तो संस्कृत वाला। दोनों एक ही नदी हैं, बस मोड़ अलग-अलग हैं।
कब गाएँ
यह विष्णु का भजन है, इसलिए यह विष्णु के दिनों का है।
एकादशी महीने में दो बार आती है — चंद्रमा के हर पक्ष के ग्यारहवें दिन। बहुत लोग उस दिन व्रत रखते हैं और मन विष्णु की ओर मोड़ते हैं। यह भजन उस दिन का अच्छा साथी है। आगे आने वाली एकादशियाँ हैं — कामिका एकादशी, रविवार ९ अगस्त २०२६ और पुत्रदा एकादशी, २३–२४ अगस्त।
कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, ४ सितंबर २०२६ को है (और कई वैष्णव मंदिरों में ५ सितंबर को)। यदि आपके घर में रात का जागरण होता है, तो यह भजन तैयार रखिए। यह गोपाल कृष्ण से शुरू होता है और गोपाल कृष्ण पर ही समाप्त होता है — और बीच में चुपचाप यह दिखा देता है कि मथुरा में उस आधी रात जन्मे बालक ही मत्स्य थे, कूर्म थे, वराह थे, नरसिंह थे।
और परिवर्तिनी एकादशी, २२ सितंबर २०२६ वामन अवतार का दिन है। उस दिन सीधे पाँचवें अंतरे पर जाइए — तीन पगों की लीला करके।
सुनिए
पहली बार केवल धुन के लिए सुनिए। दूसरी बार ऊपर दिए बोलों के साथ। हमें लगता है कि तीसरी बार तक आप बिना सोचे ही जय जगदीश हरे गा रहे होंगे।
🎧 स्पॉटिफ़ाई पर सुनिए — केशव माधव गोपाल कृष्ण
यदि इससे आपको दो पल की शांति मिले, तो इसे किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँचाइए जो इस एकादशी व्रत रख रहा है। 🙏
केशव माधव गोपाल कृष्ण — श्री जयदेव के गीत गोविंद के दशावतार स्तोत्र पर आधारित हिंदी भजन। यूट्यूब और सभी स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध, EkOmkaar Musicals से। मूल संस्कृत सुनना चाहें तो — प्रलय पयोधि जले यहाँ है (स्पॉटिफ़ाई लिंक)।
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